मैं एक स्त्री हूँ समस्त संसार कि वोह नीव जो आज कुछ सवाल पूछना चाहती है , समझ आता कि मेरा दोष क्या है ,मैंने ऐसा क्या आज मुझे इस तरह से शोषित किया जा रहा है,कहा जाता है स्त्री सृष्टि कि एक महत्पूर्ण श्रोत है,ईश्वर कि वोह सुन्दर रचना है जिसकी आराधना स्वयं ईश्वर भी करते हैं फिर आज मनुष्य कि विचारधारा किस ओर जा रही है।,एक तरफ दुर्गा कि स्तुति करता है और दूसरी तरफ माँ के रूप में पूजी जाने वाली छोटी कनयाओं को अपनी कुटिल दृष्टि से देखता है ,क्या हमारा समाज इतना दृष्टिहीन है ,कि इन पापियों ओ पहचान नहीं पता ,तथा किसी भी स्त्री कि अस्मिता लुट जाने के बाद उसी पे दोषारोपण करता है,कभी कार्य के आधार पे कभी परिधान के आधार पे,समाज में सब न्यायाधीश बन एक लुटी हुयी स्त्री बच्ची के चरित्र का निर्णय ले लेते हैं ,कहा जाता है स्त्रियों को अपनी सीमा में चाहिए क्या कोई सीमा , सारे नियम संस्कारों का बीड़ा सिर्फ स्त्रियों पे ही क्यूँ है , जब यह कहा जा सकता है कि स्त्रियों में संस्कारो का समावेश परिवार को करना चाहिए ,तो क्या वही परिवार वही समाज पुरुषों को यह नहीं सिखाता कि स्त्रियों को सम्मान दे,यदि मैं सम्माज कि प्रतिष्ठा हूँ तो क्या मेरी रक्षा का दायित्व केवल मुझ पर ही है ,मेरा विनम्र निवेदन है इस समस्त सृष्टि से कृप्या मुझे पहचाने और मेरी रक्षा में मेरा साथ दें ,क्यूंकि जब मैं सुरक्षित हूँ तभी राष्ट्र सुरक्षित है ,इसी आशा के साथ,आपकी बहिन, माँ ,पत्नी,बेटी या मित्र समस्त रूपों में स्त्री।